
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है—”यहाँ की हवाएं जितनी जल्दी रुख बदलती हैं, उतनी ही जल्दी राजनीतिक किलों की दीवारें दरकने लगती हैं।” दशकों तक जिस तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने बंगाल की मिट्टी पर एकछत्र राज किया, आज वही पार्टी अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है। हालिया चुनावी नतीजों में मिली करारी शिकस्त ने पार्टी के भीतर उस गुबार को बाहर निकाल दिया है, जो लंबे समय से दबा हुआ था। निशाने पर कोई और नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के भतीजे और पार्टी के ‘नंबर 2‘ माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी हैं।
1. जीत का गुमान और हार का कड़वा सच
चुनावों से पहले टीएमसी के गलियारों में जो आत्मविश्वास दिख रहा था, नतीजों ने उसे पूरी तरह चकनाचूर कर दिया है। ‘खेला होबे’ का नारा इस बार विपक्ष के पक्ष में जाता दिखा। जैसे ही चुनाव के परिणाम आए, पार्टी के भीतर सन्नाटा पसर गया, लेकिन यह सन्नाटा किसी बड़ी आंधी का संकेत था। हार के तुरंत बाद टीएमसी के पुराने दिग्गजों ने वह चुप्पी तोड़ दी, जो पिछले दो-तीन सालों से अनुशासन के नाम पर ओढ़ी हुई थी।
आज बंगाल की गलियों से लेकर कोलकाता के मुख्यालय तक एक ही सवाल तैर रहा है—क्या अभिषेक बनर्जी की ‘नई टीएमसी’ बंगाल की जनता की नब्ज पहचानने में नाकाम रही?
2. पुराने बनाम नए का संघर्ष: ‘कॉरपोरेट’ राजनीति पर सवाल
अभिषेक बनर्जी ने जब से पार्टी की कमान संभाली, उन्होंने टीएमसी को एक आधुनिक और ‘कॉरपोरेट स्टाइल’ की पार्टी बनाने की कोशिश की। उन्होंने डेटा, सर्वे और आई-पैक (I-PAC) जैसी एजेंसियों पर भरोसा जताया। लेकिन यही बात पार्टी के पुराने कद्दावर नेताओं को रास नहीं आई।
- जमीनी नेताओं की अनदेखी: पार्टी के वो नेता जिन्होंने 90 के दशक में ममता बनर्जी के साथ लाठियां खाई थीं, उन्हें लगने लगा कि उन्हें साइडलाइन किया जा रहा है।
- सर्वे बनाम भावनाएं: पुराने नेताओं का तर्क है कि राजनीति ‘आईपैड’ और ‘सर्वे रिपोर्ट्स’ से नहीं, बल्कि लोगों के बीच जाकर और उनके सुख-दुख में शामिल होकर की जाती है। अभिषेक की टीम ने टिकट बंटवारे में जो सख्ती दिखाई, उसने स्थानीय स्तर पर गुटबाजी को जन्म दिया।
3. टिकट वितरण और रणनीति की विफलता
इस हार का सबसे बड़ा कारण गलत प्रत्याशी चयन को माना जा रहा है। अभिषेक बनर्जी की युवा ब्रिगेड ने कई ऐसे चेहरों को मैदान में उतारा, जिनका अपनी जमीन से कोई जुड़ाव नहीं था।
हार के प्रमुख रणनीतिक कारण:
- अति-आत्मविश्वास: पार्टी को लगा कि कल्याणकारी योजनाएं (जैसे लक्ष्मी भंडार) ही जीत के लिए काफी हैं, जबकि भ्रष्टाचार और स्थानीय स्तर पर नेताओं की दबंगई के खिलाफ पनप रहे गुस्से को भांपने में वे नाकाम रहे।
- केंद्रीय नियंत्रण: जिला स्तर के नेताओं की शक्तियों को कम कर सारी ताकत अभिषेक के ‘कैंप ऑफिस’ में केंद्रित कर दी गई, जिससे ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ता हतोत्साहित हो गए।
4. बगावत के सुर: जब अपने ही हुए बेगाने
हार के बाद टीएमसी के कई वरिष्ठ विधायकों और सांसदों ने दबी जुबान में नहीं, बल्कि अब खुलकर बोलना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय मीडिया तक, कई नेता यह कह रहे हैं कि “पार्टी को अब सुधार की जरूरत है।”
कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अभिषेक बनर्जी के “एक व्यक्ति, एक पद” के फॉर्मूले ने पार्टी के अनुभवी नेताओं के पर कतरने का काम किया। इससे उन नेताओं में असुरक्षा की भावना पैदा हुई जिन्होंने पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचा था। आज स्थिति यह है कि पार्टी दो धड़ों में बंटी नजर आ रही है—एक जो अभिषेक के साथ है और दूसरा जो ममता बनर्जी के पुराने वफादारों का है।
5. ममता बनर्जी के सामने ‘धर्मसंकट’
ममता बनर्जी के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक तरफ उनका ममतामयी लगाव अपने भतीजे के प्रति है, जिसे वह अपना उत्तराधिकारी मानती हैं। दूसरी तरफ पार्टी के वो वफादार सिपाही हैं, जिन्होंने हर मुश्किल घड़ी में उनका साथ दिया।
यदि वह अभिषेक का पक्ष लेती हैं, तो पुराने दिग्गजों की नाराजगी पार्टी को तोड़ सकती है। और यदि वह पुराने नेताओं की बात मानकर अभिषेक के पर कतरती हैं, तो पार्टी का ‘आधुनिकीकरण’ रुक जाएगा और उत्तराधिकार की योजना खटाई में पड़ जाएगी।
FAQs-अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नाराजगी क्यों है?
अभिषेक की ‘कॉरपोरेट’ कार्यशैली और अनुभवी नेताओं को नजरअंदाज करना इस बगावत की मुख्य वजह है।
क्या हार के लिए केवल अभिषेक जिम्मेदार हैं?
पुराने नेताओं का मानना है कि अभिषेक की टीम और आई-पैक (I-PAC) के गलत टिकट वितरण से पार्टी हारी।
‘पुराने बनाम नए’ की लड़ाई क्या है?
यह ममता बनर्जी के वफादार पुराने नेताओं और अभिषेक बनर्जी की नई युवा ब्रिगेड के बीच वर्चस्व का संघर्ष है।
ममता बनर्जी इस पर क्या रुख अपना रही हैं?
दीदी फिलहाल चुप हैं, लेकिन वह पार्टी को टूटने से बचाने के लिए पुराने दिग्गजों को फिर से कमान सौंप सकती हैं।
अभिषेक बनर्जी की रणनीति कहाँ फेल हुई?
जमीनी हकीकत को छोड़कर केवल डेटा और सर्वे पर भरोसा करना उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक चूक रही।
क्या पार्टी के भीतर कोई समझौता संभव है?
हाँ, अगर अभिषेक अपनी जिद छोड़कर पुराने नेताओं को सत्ता में बराबर की हिस्सेदारी दें, तो सुलह हो सकती है।
बंगाल की जनता इस स्थिति पर क्या सोच रही है?
आम लोग निराश हैं, उनका कहना है कि “हमने वोट दिया, लेकिन नेता आपसी खींचतान में विकास भूल गए हैं।”
क्या यह टीएमसी की पुरानी समस्या है?
नहीं, टीएमसी हमेशा से ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व में रही है, यह उत्तराधिकार को लेकर पहली बड़ी कलह है।
अगर बगावत नहीं थमी तो क्या होगा?
पार्टी में बड़ी टूट हो सकती है और आगामी विधानसभा चुनाव में टीएमसी को सत्ता गँवानी पड़ सकती है।
अंत में टीएमसी को क्या करना चाहिए?
नेताओं को गुटबाजी छोड़नी चाहिए और ममता बनर्जी के ‘जमीनी संघर्ष’ वाले पुराने मॉडल पर वापस लौटना चाहिए।

