जब कोई बच्चा पहली बार सूटकेस पैक करके घर से दूर कॉलेज के लिए निकलता है, तो उसके बैग में सिर्फ कपड़े और किताबें नहीं होतीं; उसमें माता-पिता के ढेरों सपने, उम्मीदें और एक उज्ज्वल भविष्य की कल्पना भी होती है। बच्चा वादा करके जाता है कि वह खूब पढ़ाई करेगा और कुछ बनकर लौटेगा। लेकिन सोचिए, क्या गुज़रती होगी उन माता-पिता पर जब कुछ ही दिनों बाद उनके पास अपने बच्चे की कोई ऐसी तस्वीर या वीडियो पहुंचे, जिसमें वह बेबस, डरा हुआ और प्रताड़ित नज़र आ रहा हो?

हाल ही में एजुकेशन हब कहे जाने वाले ‘ग्रेटर नोएडा’ के एक नामी शिक्षण संस्थान से रैगिंग की एक ऐसी ही चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर ने सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनल्स तक, हर जगह तहलका मचा दिया है। इसने एक बार फिर उस भयानक सच्चाई को बेनकाब कर दिया है जिसे अक्सर ‘इंट्रोडक्शन’ या ‘कॉलेज के मज़ाक’ के नाम पर छिपाने की कोशिश की जाती है। सवाल यह है कि तमाम कड़े कानूनों और एंटी-रैगिंग कमेटियों के दावों के बावजूद, हमारे कॉलेज खौफ के अड्डे क्यों बने हुए हैं?
शिक्षा का मंदिर या खौफ का अड्डा?
ग्रेटर नोएडा आज के समय में देश के सबसे बड़े ‘एजुकेशन हब’ (Education Hub) में से एक है। हर साल उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली और देश के कोने-कोने से लाखों छात्र यहां के प्राइवेट और सरकारी कॉलेजों में दाखिला लेते हैं। बाहर से देखने पर इन कॉलेजों के आलीशान कैंपस, एसी क्लासरूम और चमचमाती कैंटीन किसी फाइव-स्टार होटल से कम नहीं लगते।
लेकिन इन गगनचुंबी इमारतों के पीछे बने हॉस्टल के बंद कमरों में रात के अंधेरे में क्या होता है, यह तस्वीर उसी काले सच का सुबूत है। यह दिखाती है कि कैसे ‘सीनियोरिटी’ का रौब झाड़ने के लिए नए छात्रों (जूनियर्स) की गरिमा और आत्मसम्मान को पैरों तले रौंदा जाता है।
‘मज़ाक’ नहीं, यह मानसिक और शारीरिक सताना है
रैगिंग की शुरुआत अक्सर ‘इंट्रो’ (Intro) या ‘आइस-ब्रेकिंग’ के नाम पर होती है। सीनियर्स तर्क देते हैं कि इससे जूनियर छात्रों का डर खत्म होता है और वे कॉलेज के माहौल में घुल-मिल जाते हैं। लेकिन यह तथाकथित इंट्रोडक्शन कब गंदी गालियों, शारीरिक यातना और मानसिक प्रताड़ना में बदल जाता है, किसी को पता ही नहीं चलता। इसके पीछे एक बहुत बीमार मानसिकता काम करती है:
- सत्ता का नशा (Power Trip): 19-20 साल के युवाओं के लिए, अपने से छोटे छात्रों पर हुक्म चलाना और उन्हें बेबस देखना एक तरह का ‘पावर ट्रिप’ देता है। वे खुद को कैंपस का ‘बॉस’ साबित करना चाहते हैं।
- परंपरा के नाम पर बदला: हॉस्टलों में एक खतरनाक चक्र चलता है—”हमारे सीनियर्स ने हमारी रैगिंग ली थी, तो अब हम भी अपने जूनियर्स की लेंगे।” यह बदला लेने की एक अनकही परंपरा बन गई है।
- भीड़ की मानसिकता (Mob Mentality): कई बार एक अकेला छात्र शायद किसी को नुकसान न पहुंचाए, लेकिन 5-10 लड़कों का ग्रुप बनते ही उनकी इंसानियत खत्म हो जाती है। वे भीड़ के नशे में कुछ भी कर गुज़रते हैं।
नियम, कानून और व्यवस्था की नाकामी:
सुप्रीम कोर्ट की सख्त गाइडलाइंस और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नियमों के अनुसार, रैगिंग एक संगीन अपराध है। इसके लिए कॉलेज से निष्कासन और जेल तक की सज़ा का प्रावधान है। हर कॉलेज में ‘एंटी-रैगिंग कमेटी’ होना अनिवार्य है। तो फिर सिस्टम फेल कहां हो रहा है?
- संस्थान की ‘रेप्युटेशन’ का डर: यह सबसे बड़ा कारण है। जब भी रैगिंग का मामला सामने आता है, कॉलेज प्रशासन सबसे पहले उसे दबाने की कोशिश करता है। उन्हें डर होता है कि अगर पुलिस केस हुआ या बात मीडिया में गई, तो अगले साल एडमिशन कम हो जाएंगे।
- कागज़ी कमेटियां: कई कॉलेजों में एंटी-रैगिंग स्क्वॉड सिर्फ यूजीसी को दिखाने के लिए कागज़ों पर बने होते हैं। रात के समय हॉस्टल पूरी तरह सीनियर्स के रहमो-करम पर होते हैं।
- खामोशी की मजबूरी: एक नया छात्र, जो घर से दूर है, वह शिकायत करने से डरता है। सीनियर्स धमकी देते हैं कि शिकायत की तो 4 साल जीना हराम कर देंगे या प्रोफेसर्स से कहकर प्रैक्टिकल में फेल करवा देंगे। ‘बायकॉट’ होने के डर से पीड़ित घुट-घुट कर सब सहता रहता है।
माता-पिता के लिए अलार्म: संकेतों को पहचानें
कॉलेज और पुलिस की जिम्मेदारी अपनी जगह है, लेकिन माता-पिता को भी बहुत सतर्क रहना होगा। डरा हुआ बच्चा अक्सर खुद नहीं बताता कि उसके साथ क्या हो रहा है। माता-पिता को इन संकेतों (Warning Signs) को समझना चाहिए:
- व्यवहार में अचानक बदलाव: अगर आपका हमेशा हंसने-चहकने वाला बच्चा अचानक चुपचाप रहने लगे, बात-बात पर चिड़चिड़ा हो जाए या फोन पर जल्दी बात खत्म करने की कोशिश करे।
- पैसे की बार-बार मांग: सीनियर्स अक्सर रैगिंग के नाम पर जूनियर्स से अपने लिए शराब, सिगरेट या खाना मंगवाते हैं। अगर बच्चा बिना किसी ठोस कारण के बार-बार ज्यादा पैसे मांगे, तो यह खतरे की घंटी है।
- कॉलेज जाने से डरना: अगर बच्चा छुट्टियों के बाद वापस हॉस्टल जाने के नाम पर घबराए, रोए या बीमार होने का बहाना बनाए।
- चोट के निशान: कपड़ों के अंदर छिपे खरोंच या चोट के निशान, जिन्हें बच्चा ‘सीढ़ियों से गिरने’ या ‘खेलते वक्त लगने’ का बहाना बनाकर टाल दे।
“समाधान: इस बदबू को कैसे खत्म करें?”
- सच्ची ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति: कॉलेजों को यह समझना होगा कि उनकी साख रैगिंग छिपाने से नहीं, बल्कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने से बढ़ती है। दोषी पाए जाने पर छात्र को तुरंत सस्पेंड कर पुलिस के हवाले किया जाना चाहिए।
- प्रशासन की जवाबदेही: अगर किसी हॉस्टल में रैगिंग होती है, तो सिर्फ छात्रों पर ही नहीं, बल्कि उस हॉस्टल के वॉर्डन और कॉलेज मैनेजमेंट पर भी केस दर्ज होना चाहिए। जब नौकरी खतरे में दिखेगी, तो वे खुद रात-रात भर जागकर गश्त करेंगे।
- फ्रेशर्स के लिए अलग हॉस्टल: पहले साल के छात्रों के लिए हॉस्टल पूरी तरह से अलग होना चाहिए, जहां सीनियर छात्रों की एंट्री पूरी तरह से बैन हो।
- अनाम (Anonymous) शिकायत प्रणाली: छात्रों के पास एक ऐसा सिस्टम होना चाहिए जहां वे अपनी पहचान छिपाकर सीधे पुलिस या यूजीसी को सबूत (ऑडियो/वीडियो) भेज सकें।
FAQ – रैगिंग ने फिर उठाए सवाल
1. रैगिंग क्या है?
- किसी भी नए छात्र (जूनियर) को शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक रूप से प्रताड़ित करना और उसे असहज महसूस कराना रैगिंग कहलाता है।
2. क्या भारत में रैगिंग एक कानूनी अपराध है?
- हाँ, सुप्रीम कोर्ट और UGC के सख्त नियमों के तहत रैगिंग एक गंभीर और दंडनीय आपराधिक कृत्य है।
3. रैगिंग होने पर छात्र तुरंत कहाँ शिकायत कर सकते हैं?
- छात्र नेशनल एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन नंबर (1800-180-5522) पर कॉल करके या कॉलेज की एंटी-रैगिंग कमेटी को शिकायत कर सकते हैं।
4. ग्रेटर नोएडा से जुड़ा हालिया विवाद क्या है?
- ग्रेटर नोएडा के एक नामी कॉलेज में सीनियर छात्रों द्वारा एक जूनियर की बर्बर रैगिंग की तस्वीर वायरल होने के बाद यह मुद्दा फिर गरमाया है।
5. रैगिंग का दोषी पाए जाने पर क्या सज़ा मिल सकती है?
- दोषी छात्र को तुरंत कॉलेज से निष्कासित (Suspend) किया जा सकता है, भारी जुर्माना लग सकता है और जेल भी हो सकती है।
6. क्या रैगिंग की शिकायत गुमनाम (Anonymous) तरीके से की जा सकती है?
- हाँ, छात्र अपनी पहचान छिपाकर UGC के एंटी-रैगिंग पोर्टल या हेल्पलाइन के माध्यम से सुरक्षित रूप से शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
7. ‘एंटी-रैगिंग कमेटी’ का क्या काम होता है?
- यह हर शिक्षण संस्थान की एक अनिवार्य संस्था है, जिसका काम कैंपस में रैगिंग रोकना और शिकायतों पर त्वरित कानूनी कार्रवाई करना है।
8. माता-पिता कैसे पहचानें कि उनका बच्चा रैगिंग का शिकार हो रहा है?
- बच्चे का अचानक गुमसुम हो जाना, कॉलेज जाने से डरना, चिड़चिड़ा होना या बार-बार फालतू पैसे मांगना रैगिंग के संकेत हो सकते हैं।
9. नए छात्रों (Freshers) की सुरक्षा के लिए हॉस्टल में क्या नियम हैं?
- नियमों के अनुसार फ्रेशर्स के लिए हॉस्टल बिल्कुल अलग होना चाहिए और रात में वार्डन या गार्ड्स की औचक गश्त अनिवार्य है।
10. रैगिंग पूरी तरह से खत्म क्यों नहीं हो पा रही है?
- कॉलेज प्रशासन द्वारा अपनी ‘साख’ (Reputation) बचाने के लिए मामलों को दबाने की कोशिश रैगिंग खत्म न होने का सबसे बड़ा कारण है।

